बेटी की चीत्कार || महिला उत्पीड़न पर कविता

 

महिला उत्पीड़न पर कविता

   बेटी की चीत्कार


ओ माँ 
क्यों जना तुमने मुझे??
मार न देती कोख में
बेटी सुन ,कितने ताने सुने होंगे तुमने
ये न हो सका तो
फेक आती मुझे झाड़ी में
क्या होता
कुत्ते नोंच खाते मुझे
बस यही ना
अस्मत तो न लुटती मेरी
भरे बाज़ार में
वो असल जानवर होते
मुखौटे पहने आदमखोर नहीं


ओ माँ
जब बेटी सुरक्षित नहीं धरा में
तब कन्या भ्रूण हत्या अपराध का ढोंग क्यों
इक बेटी की चीत्कार 
क्यों सुन न पाती सरकार
ऊँची पहुँच को ढाकने तोपने का खेल क्यों
देवी बना कब तक सहलाएगी संसार
मानुष है 
उसे सम्वेदना की है दरकार
वह भी स्वच्छंद जीने की है हकदार
जन आक्रोश बस मोमबत्ती तक सीमित क्यों
बीच चौराहे दरिंदों को फाँसी नहीं क्यों 
जिसे देख सिहर उठे पाशविक सोच


ओ माँ
आज नर पिशाचों की मैं हुई शिकार 
कल कोई
फिर कोई
प्रतिदिन कोई न कोई
आज तुम सिसक रही हो
कल फिर कलेजा फटेगा किसी माँ का
अभिमान टूटेगा पिता का
कब थमेगा ये सिलसिला
बेख़ौफ़ कब जियेगी बिटिया
अब तो जागो सरकार
त्वरित करो इंसाफ़
त्वरित करो इंसाफ़


डॉ.कुमुदिनी



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