डर लगता है || कोरोना महामारी पर कविता

 




डर लगता है


कैसा ये संकट कैसी महामारी

अपनों के बीच ही मायूसी भरी दूरी

तुम्हीं से अर्जित हमें निवाला

तुम्हीं को देने में , डर लगता है ।


तुम्हीं हो धुरी घर आँगन के

तुम्हीं से हिम्मत तुम्हीं से हम सब

कैसी ये बेला जीवन में आई

तुम्हीं को छूने में ,डर लगता है ।


तेज भरा तुम्हारा वो चेहरा

निर्णय लेने की तुम्हारी क्षमता

कोरोना व्याधि ने कोहराम ढाया

तुम्हीं को विवश देख ,डर लगता है ।


ज्ञान विज्ञान सभी इससे हारे

चिकित्सक ही भगवान वो ही फ़रिश्ते

मिलेगी कब मुक्ति कोई न जाने

घर से निकलने में ,डर लगता है ।


घरों में कैद रहने की विवशता

सुख दुख में साथ न होने की निराशा

ओ मेरे बन्धु ओ मेरे भ्राता

तुम्हीं से मिलने में डर लगता है ।


(डॉ.कुमुदिनी)

             


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